मैं नज़र से पी रहा हूँ

Lyricist: Anwar Mirzapuri
Singer: Ghulam Ali

अपनी आवाज़ की लर्ज़िश पे तो क़ाबू पा लूँ
प्यार के बोल तो होठों से निकल जाते है
अपने तेवर तो सँभालो कोई ये न कहे
दिल बदलते हैं तो चेहरे भी बदल जाते हैं।

मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए
न झुकाओ तुम निग़ाहें कहीं रात ढल न जाए।

मेरे अश्क भी हैं इसमें ये शराब उबल न जाए
मेरा जाम छूने वाले तेरा हाथ जल न जाए।

मेरी ज़िन्दग़ी के मालिक मेरे दिल पे हाथ रखना
तेरे आने की खुशी में मेरा दन निकल न जाए।

अभी रात कुछ है बाकी न उठा नक़ाब साकी
तेरा रिन्द गिरते गिरते कहीं फिर सँभल न जाए।

इसी ख़ौफ़ से नशेमन न बना सका मैं ‘अनवर’
कि निग़ाह-ए-अहल-ए-गुलशन कहीं फिर बदल न जाए।


लर्ज़िश = Quiver
रिन्द = Drunkard
अहल = Inhabitant, People, Residents

2 Responses to मैं नज़र से पी रहा हूँ

  1. Kunal Goel says:

    I’m not sure if the first quatrain
    is by Anwar Mirzapuri, becuz I’ve heard this quatrain in another ghazal of ghulam ali.

  2. Jaya says:

    Yes, that’s why the two parts are separated. I have written the name of lyricist for the main Ghazal.

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