खुली जो आँख तो वो था न वो ज़माना था

Lyricist: Farhat Sahzad
Singer: Mehdi Hasan

खुली जो आँख तो वो था न वो ज़माना था
दहकती आग थी तनहाई थी फ़साना था।

ग़मों ने बाँट लिया मुझे यूँ आपस में
कि जैसे मैं कोई लूटा हुआ ख़ज़ाना था।

ये क्या चंद ही क़दमों पे थक के बैठ गए
तुम्हें तो साथ मेरा दूर तक निभाना था।

मुझे जो मेरे लहू में डुबो के गुज़रा है
वो कोई ग़ैर नहीं यार एक पुराना था।

ख़ुद अपने हाथ से ‘शहज़ाद’ उसे काट दिया
कि जिस दरख़्त के तनहाई पे आशियाना था।

5 Responses to खुली जो आँख तो वो था न वो ज़माना था

  1. Dilshad says:

    in the last sher it should be ‘TEHNI’ not ‘TANHAI’.
    Thanks
    Dilshad

  2. Satish shahil says:

    es ghazal ke bare me kya kahun

    supper

  3. Sankalp says:

    bharam khuulus-o-mohabbat ka jaan reh jaata
    zara sii deer mera pyaar to azmaana tha

  4. shiwashankar rai says:

    kya kaha hai yar

  5. Nishant kushwaha says:

    खुशी की इस अदा में दर्द दबा के बैठे हैं,
    अपने गमों की मन्जील को गले लगा के बैठे हैं,

    कभी तो आयेगी करीब मौज तेरे वफा की,
    मेरे दिल के शाहील भी नजरें जमा के बैठै हैं,

    कायनात भी हो रौशन खिड़कीयाँ तो खोल दें,
    जो लोग घरों में रोशनी अपने जला के बैठे हैं,

    तुझे सौगात दूँ वफा की आ मेरे बज्में शहर में,
    अपने लहु का हर कतरा यहाँ सजा के बैठे हैं।

    Written by~”Nishant”

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