ये दिल, ये पागल दिल मेरा

Lyricist: Mohsin Naqvi
Singer: Ghulam Ali

अंदाज़ अपने देखते हैं आईने में वो
और ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो।

ये दिल, ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया, आवारगी
इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ, आवारगी।

कल शब मुझे बेशक्ल सी आवाज़ ने चौंका दिया
मैंने कहा तू कौन है उसने कहा आवारगी।

इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबब
सहरा की भीगी रेत पर मैंने लिखा आवारगी।

ये दर्द की तनहाइयाँ, ये दश्त का वीराँ सफ़र
हम लोग तो उकता गये अपनी सुना, आवारगी।

कल रात तनहा चाँद को देखा था मैंने ख़्वाब में
‘मोहसिन’ मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी।

दश्त = Desert
शब = Night
सबब = Reason

13 Responses to ये दिल, ये पागल दिल मेरा

  1. Actually, there are at least three other sher-s in this ghazal, of which I have never heard Ghulam Ali singing two. But ‘ye dard kii…’ is not the last sher, the maqtaa one ” ‘mohsin’ mujhe raas aayegii” follows it.
    See the lyrics at:
    http://www.cs.wisc.edu/~navin/india/songs/isongs/additions/N9021_gif.html

  2. Jaya says:

    Thanks🙂 Its updated!

  3. Kunal Goel says:

    You haven’t included my favourite sher:
    Ek tu ki sadiyon se mere humraah bhi, humraaz bhi,
    Ek main ji tere naam se na-aashna, aawargi.
    By the way this ghazal can be interpreted in many ways. I like the embiguity of the ghazal.

  4. Ganesh Kesarkar says:

    I am always head gazals of Gulam Ali sahab

  5. आशुतोष says:

    Can you post meaning of this gazal (verbatim will do) in english? or best if you know marathi, in marathi.

  6. asif says:

    i am say som thgink about gulam ali sub it is one wo good of god

  7. SANDHYA says:

    hame is gazal se behad pyaar hai.

  8. this gazal really i liked very much in my childhood i dont know whats the meaninng of that buti had enjoyed now i know little bit of meanings any how gulam ali sahab is my fav. gazazl singer…

  9. satyendra kurariya says:

    hi mr,gulam ali jee kaise hai app mujhe app ki gajals bahut ACCHI LAGTI HAIN?

  10. nimish says:

    ये दिल, ये पागल दिल मेरा, क्यों बुझ गया, आवारगी
    इस दश्त में इक शहर था, वो क्या हुआ, आवारगी

    कल शब मुझे बे-शक्ल सी, आवाज़ ने चौँका दिया
    मैंने कहा तू कौन है, उसने कहा, आवारगी

    इक तू कि सदियों से, मेरे हम-राह भी हम-राज़ भी
    इक मैं कि तेरे नाम से न-आश्ना, आवारगी

    ये दर्द की तनहाइयाँ, ये दश्त का वीरां सफ़र
    हम लोग तो उक्ता गये अपनी सुना, आवारगी

    इक अजनबी झोंके ने पूछा, मेरे ग़म का सबब
    सहरा की भीगी रेत मैंने लिखा, आवारगी

    ले अब तो दश्त-ए-शब की, सारी वुस’अतें सोने लगीं
    अब जागना होगा हमें कब तक बता, आवारगी

    कल रात तनहा चाँद को, देखा था मैंने ख़्वाब में
    ‘मोह्सिन’ मुझे रास आयेगी शायद सदा, आवारगी

    शायर:-मोहसिन नक्वी

  11. Parth Parekh says:

    Awesome thanks

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