January 24, 2008
Lyrics: Ahmed Faraz
Singer: Ghulam Ali
ऐसे चुप है कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे,
तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे।
अपने ही साये से हर गाम लरज़ जाता हूँ,
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे।
कितने नादाँ हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे
याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे।
मंज़िलें दूर भी हैं, मंज़िलें नज़दीक भी हैं,
अपने ही पाँवों में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे।
आज दिल खोल के रोए हैं तो यों खुश हैं ‘फ़राज़’
चंद लमहों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।
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गाम = Step
लरज़ = Shake
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Ahmed Faraz, ऐ |
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Posted by Jaya
August 1, 2005
Lyricist: Ahmed Faraz
Singer: Ghulam Ali
करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे,
गज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे।
वो ख़ार-ख़ार है शाख-ए-गुलाब की मानिंद
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे।
ये लोग तज़किरे करते हैं अपने प्यारों के
मैं किससे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे।
जो हमसफ़र सरे मंज़िल बिछड़ रहा है ‘फ़राज़’
अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे।
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तज़किरे (तज़किरा) = Mention, Talk about
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Posted by Jaya
July 27, 2005
Lyricist: Ahmed Faraz
Singer: Ghulam Ali
जो भी दुख याद न था याद आया
आज क्या जानिए क्या याद आया।
याद आया था बिछड़ना तेरा
फिर नहीं याद कि क्या याद आया।
हाथ उठाए था कि दिल बैठ गया
जाने क्या वक़्त-ए-दुआ याद आया।
जिस तरह धुंध में लिपटे हुए फूल
इक इक नक़्श तेरा याद आया।
ये मोहब्बत भी है क्या रोग ‘फ़राज़’
जिसको भूले वो सदा याद आया।
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Posted by Jaya
July 24, 2005
Lyricist: Ahmed Faraz
Singer: Ghulam Ali
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला
वो ही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला।
क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उससे
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला।
क्या ख़बर थी जो मेरी जाँ में घुला रहता है
है वही मुझको सर-ए-दार भी लाने वाला।
मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला।
तुम तक़ल्लुफ़ को भी इख़लास समझते हो ‘फ़राज़’
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला।
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मरासिम = Relations, Agreements
सर-ए-दार = At the Tomb
ताबीर = Interpretation
तक़ल्लुफ़ = Formality
इख़लास = Sincerity, Love, Selfless Worship
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Posted by Jaya
July 10, 2005
Lyricist: Ahmed Faraz
Singer: Ghulam Ali
ज़िन्दगी से यही ग़िला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे।
हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं
मुसाफ़िर ही काफ़िला है मुझे।
दिल धड़कता नहीं सुलगता है
वो जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे
लबकुशा हूँ तो इस यक़ीन के साथ
क़त्ल होने का हौसला है मुझे।
कौन जाने कि चाहतों में ‘फ़राज़’
क्या गँवाया है क्या मिला है मुझे।
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आबला = Blister
लबकुशा= Am not very sure, but see the following from Dictionary.
kushā = Opening, expanding; displaying; loosening; solving; revealing; conquering (used as last member of compounds, e.g. dilkushā, `heart-expanding’; — mushkil-kushā, `difficulty-solving’).
and “लब” means “lips”.
So, most like लबकुशा means “opening the lips” or speaking out. Thus, the meaning of the whole “sher” becomes - I open my mouth/speak out because I believe I have the courage to die.
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Posted by Jaya
July 6, 2005
Lyricist: Ahmed Faraz
Singer: Ghulam Ali
कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो।
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो।
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो।
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
ये एक शब की मुलाक़ात भी गनीमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो।
तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जाना हमें भी करना है
‘फ़राज़’ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
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शब = Night
तवाफ़ = Going Round
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Ahmed Faraz, क |
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Posted by Jaya