January 23, 2008
Lyrics:
Singer: Ghulam Ali
गली-गली तेरी याद बिछी है, प्यार रस्ता देख के चल
मुझसे इतनी वहशत है तो मेरी हदों से से दूर निकल।
एक समय तेरा फूल-सा नाज़ुक हाथ था मेरे शानों पर
एक ये वक़्त कि मैं तनहा और दुख के काँटों का जंगल।
याद है अब तक तुझसे बिछड़ने की वो अँधेरी शाम मुझे
तू ख़ामोश खड़ा था लेकिन बातें करता था काजल।
मेरा मुँह क्या देख रहा है, देख उस काली रात तो देख
मैं वही तेरा हमराही हूँ, साथ मेरे चलना है तो चल।
No Comments » |
ग |
Permalink
Posted by Jaya
October 25, 2005
Lyrics: Asghar Saleem
Singer: Mehdi Hasan
गुलशन-गुलशन शोला-ए-ग़ुल की ज़ुल्फ़-ए-सबा की बात चली
हर्फ़-ए-जुनूँ की बंद-गिराँ की ज़ुल्म-ओ-सज़ा की बात चली।
ज़िंदा-ज़िंदा शोर-ए-जुनूँ है मौसम-ए-गुल के आने से
महफ़िल-महफ़िल अबके बरस अरबाब-ए-वफ़ा की बात चली।
अहद-ए-सितम है देखें हम आशुफ़्ता-सरों पर क्या गुजरे
शहर में उसके बंद-ए-क़बा के रंग-ए-हिना की बात चली।
एक हुआ दीवाना एक ने सर तेशे से फोड़ लिया
कैसे-कैसे लोग थे जिनसे रस्म-ए-वफ़ा की बात चली।
–
सबा=Breeze, wind
हर्फ़-ए-जुनूँ = A word that describes craziness
अरबाब = Friends
अहद-ए-सितम = Days of Tyranny/Cruelty
आशुफ़्ता = Perplexed, Careworn, Distracted, Confused
आशुफ़्ता-सर = Mentally Deranged
क़बा = Gown, Long Coat Like Garment (I think it has been used in the sense of बुर्का here)
बंद-ए-क़बा = Locked in the gown/बुर्का
तेशे = Axe
2 Comments |
Asghar Saleem, ग |
Permalink
Posted by Jaya
July 15, 2005
Lyricist: Ashoor Kazmi (I am not sure of this name)
Singer: Ghulam Ali
गर्दिश-ए-दौराँ का शिकवा था मगर इतना न था
तुम न थे तब भी मैं तनहा था मगर इतना न था।
दोस्ती के नाम पर पहले भी खाए थे फ़रेब
दोस्तों ने दर्द बख़्शा था मगर इतना न था।
तुमसे पहले ज़िन्दग़ी बे-कैफ़ थी बेनाम थी
रास्तों में घुप अँधेरा था मगर इतना न था।
तुम मिले तो बढ़ गई कुछ और दिल की बेकली
सिलसिला था बे-यकीन का मगर इतना न था।
हर तरफ चर्चे हैं अब मेरे तुम्हारे नाम के
शहर में ‘आशूर’ रुसवा था मगर इतना न था।
1 Comment |
ग |
Permalink
Posted by Jaya