अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

September 3, 2006

Lyrics: Nida Fazli
Singer: Jagjit Singh

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं।

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं।

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम हैं।


अपनी ग़ज़लों में तेरा हुस्न सुनाऊँ आ जा

July 26, 2005

Lyricist:
Singer: Ghulam Ali

अपनी ग़ज़लों में तेरा हुस्न सुनाऊँ आ जा
आ ग़म-ए-यार तुझे दिल में बसाऊँ आ जा।

बिन किए बात तुझे बात सुनाकर दिल की
तेरी आँखों में हया रंग सजाऊँ आ जा।

अनछुए होंठ तेरे एक कली से छू कर
उसको मफ़हूम नज़ाक़त से मिलाऊँ आ जा।

मैंने माना कि तू साक़ी है मैं मैकश तेरा
आज तू पी मैं तुझे जाम पिलाऊँ आ जा।

हीर वारिस की सुनाऊँ मैं तुझे शाम ढले
तुझमें सोए हुए जज़्बों को जगाऊँ आ जा।

ऐं मेरे सीने में हर आन धड़कती ख़ुशबू
आ मेरे दिल में तुझे तुझसे मिलाऊँ आ जा।

मफ़हूम = To be taken to mean, Understood
हीर वारिस की: This is an explanation and not a meaning. The famous Punjabi poetry “Heer Ranjha” was written by Warris Shah. This is what is being referred to here.
आन = Moment


अल्लाह, अल्लाह, लुत्फ क्या साकी के मैख़ाने में है

June 29, 2005

Lyricist: Sant Darshan Singh
Singer: Ghulam Ali

अल्लाह, अल्लाह, लुत्फ क्या साकी के मैख़ाने में है
जलवागरी राग-ए-दो-आलम उसके पैमाने में है।

दैर में क्या जुस्तजू है, क्या है काबे में तलाश
चश्म-ए-बा-तिन खोल वो दिल के सनमखाने में है।

कौन जाने क्या तमाशा है कि हादी के बग़ैर
इक हुजूम-ए-नगमदीर दिल के दवाखाने में है।

बैठै-बैठै ख़ुद मुझे होता है अक्सर ये गुमाँ
नगमगर मुतरिब कोई दिल के तलबखाने में है।

जिन्दगी मे तुझको ‘दर्शन’ मिल नहीं सकता कहीं
वो सुरूर-ए-कैफ़ जो मुज़्जत के खुमखाने मे है।


जलवागरी = Manifestation
राग = Melody
दो-आलम = Two Worlds
दैर = Temple
जुस्तजू = Desire, Search, Inquiry
चश्म = Eye
बा-तिन = Conscience
हादी = Instruments
मुतरिब = Singer
सुरूर = Joy, Pleasure, Rapture
कैफ़ = Happiness
खुम = Wine


अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको

June 24, 2005

Lyricist: Qateel Shifai
Singer: Jagjeet Singh

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको।

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको।

ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।

बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी जाऊँ ‘क़तील’
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।

बादाह  = Wine, Spirits