बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया है मेरे आगे

September 18, 2006

Lyrics: Mirza Ghalib
Singer: Jagjit Singh

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया है मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।

होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे।

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।

ईमान मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल = Children’s Playground
शब-ओ-रोज़ = Night and Day
निहाँ = निहान = Hidden, Buried, Latent
जबीं = जबीन = Brow, Forehead
कुफ़्र = Infidelity, Profanity, Impiety
कलीसा = Church
जुम्बिश = Movement, Vibration
सागर = Wine Goblet, Ocean, Wine-Glass, Wine-Cup
मीना = Wine Decanter, Container


मुसाफ़िर हैं हम तो

September 13, 2006

Lyrics: Hasrat Jaipuri
Singer : Hussain Brothers
मुसाफ़िर हैं हम तो चले जा रहे हैं बड़ा ही सुहाना ग़ज़ल का सफ़र है।
पता पूछते हो तो इतना पता है हमारा ठिकाना गुलाबी नगर है।

ग़ज़ल ही हमारा अनोखा जहाँ है ग़ज़ल प्यार की वो हसीं दासताँ है।
इसे जो भी सुनता है, वो झूमता है वो जादू है इसमें कुछ ऐसा असर है।

ना कोई थकन है, न कोई ख़लिश है मोहब्बत की जाने ये कैसी कशिश है।
जिसे देखिए वो चला जा रहा है, जहान-ए-ग़ज़ल की सुहानी डगर है।

वली, मीर, मोमिन ने इसको निखारा जिगर, दाग़, ग़ालिब ने इसको सँवारा।
इसे मोसिक़ी ने गले से लगाया ग़ज़ल आज दुनिया के पेश-ए-नज़र है।

यही है हमारा ताल्लुक़ ग़ज़ल से हम इसके लिए ये हमारे लिए है।
ये अपनी कहानी ज़माने में ‘हसरत’ सभी को पता है, सभी को ख़बर है।


प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है

September 9, 2006

Lyrics: Hasti
Singer: Jagjit Singh

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है
नये परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था,
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।

गाँठ अगर पड़ जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी,
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है।

हमने इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो ढूँढ़ लिया है,
गहरे ज़ख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है।


अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

September 3, 2006

Lyrics: Nida Fazli
Singer: Jagjit Singh

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं।

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं।

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम हैं।