हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद
Lyrics: Dr. Rahi Masoon Raza
Singer: Abida Parveen
हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पे कितना तनहा होगा चाँद।
चाँद बिना हर शब यों बीती जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद।
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आ पिया मोरे नैनन में मैं पलक ढाँप तोहे लूँ
ना मैं देखूँ और को, ना तोहे देखन दूँ।
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रात ने ऐसा पेंच लगाया टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चाँद।
November 20, 2005 at 1:03 pm
जहाँ तक मुझे ध्यान है, ग़ज़ल में तद्भव रूपों ‘परदेस’ और ‘देस’ का प्रयोग हुआ है। जाँच लें। आबिदा ने भी शायद वही (तद्भव-रूप) गाया है।
November 20, 2005 at 4:25 pm
विनय सही कह रहे हैं। एक और शे’र -
जिन आँखों में काजल बन कर तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक कतरा होगा चान्द।
July 18, 2006 at 7:33 pm
Actually it is Purabi touch…..these days Purabi may not be spoken in films but it has a great influence on Urdu. Des and Pardes….not desh and Pardesh.