July 24, 2005
Lyricist: Ahmed Faraz
Singer: Ghulam Ali
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला
वो ही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला।
क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उससे
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला।
क्या ख़बर थी जो मेरी जाँ में घुला रहता है
है वही मुझको सर-ए-दार भी लाने वाला।
मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला।
तुम तक़ल्लुफ़ को भी इख़लास समझते हो ‘फ़राज़’
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला।
–
मरासिम = Relations, Agreements
सर-ए-दार = At the Tomb
ताबीर = Interpretation
तक़ल्लुफ़ = Formality
इख़लास = Sincerity, Love, Selfless Worship
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Ahmed Faraz |
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July 24, 2005
Lyricist: Akbar Allahabadi
Singer: Ghulam Ali
हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है।
उस मय से नहीं मतलब दिल जिससे हो बेगाना
मकसूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है।
–
उधर ज़ुल्फ़ों में कंघी हो रही है, ख़म निकलता है
इधर रुक रुक के खिंच खिंच के हमारा दम निकलता है।
इलाही ख़ैर हो उलझन पे उलझन बढ़ती जाती है
न उनका ख़म निकलता है न हमारा दम निकलता है।
–
सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हमको कहें काफ़िर अल्लाह की मरज़ी है।
–
गर सियाह-बख़्त ही होना था नसीबों में मेरे
ज़ुल्फ़ होता तेरे रुख़सार कि या तिल होता।
जाम जब पीता हूँ मुँह से कहता हूँ बिसमिल्लाह
कौन कहता है कि रिन्दों को ख़ुदा याद नहीं।
–
मय = Wine
ख़म=Curls of the Hhair (ख़म means “Bend ” or “Curve”, but here can be thought of meaning curls of the hair)
मकसूद = Intended, Proposed
सियाह= स्याह = Black
बख़्त = Fate
रिन्द = Drunkard
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Akbar Allahabadi, ह |
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July 23, 2005
Lyricist: Dagh Dehalvi
Singer: Ghulam Ali
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा।
तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है
किसके उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा।
अपनी आँखों में अभी कौंध गयी बिजली-सी
हम न समझे कि ये आना है कि जाना तेरा।
तू ख़ुदा तो नहीं ऐ नासिह नादाँ मेरा
क्या ख़ता की जो कहा मैंने ना माना तेरा।
–
नासिह = Advisor, Preacher
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Dagh Dehalvi, ल |
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July 23, 2005
Lyricist:
Singer: Ghulam Ali
शौक से नाक़ामी की बदौलत कूचा-ए-दिल ही छूट गया
सारी उम्मीदें टूट गईं दिल बैठ गया जी छूट गया।
लीजिए क्या दामन की ख़बर और दस्त-ए-जुनूँ को क्या कहिए
अपने ही हाथ से दिल का दामन मुद्दत गुज़री छूट गया।
मंज़िल-ए-इश्क पे तनहा पहुँचे कोई तमन्ना साथ न थी
थक थक कर इस राह में आख़िर इक इक साथी छूट गया।
फ़ानी हम तो जीते-जी वो मैयत हैं बे-गोर-ओ-कफ़न
गुरबत जिसको रास न आई और वतन भी छूट गया।
–
कूचा = Lane, A narrow street
दस्त = Hands
जुनूँ = जुनून = Ecstasy, Frenzy, Insanity
फ़ानी = Mortal
मैयत = Corpse
गोर = Tomb
कफ़न = Cloth To Cover The Corpse, Shroud
गुरबत = Exile
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श |
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July 22, 2005
Lyricist:
Singer: Mehdi Hasan
ज़िन्दग़ी की राह में टकरा गया कोई
इक रोशनी अँधेरे में दिखला गया कोई।
वो हादसा वो पहली मुलाक़ात क्या कहूँ,
कितनी अजब थी सूरत-ए-हालात क्या कहूँ।
वो क़हर, वो ग़ज़ब, वो जफ़ा मुझको याद है,
वो उसकी बेरुख़ी की अदा मुझको याद है।
मिटता नहीं है ज़ेहन से यूँ छा गया कोई।
पहले वो मुझको देखकर बरहम-सी हो गई,
फिर अपने ही हसीन ख़यालों में खो गई।
बेचारगी में मेरी उसे रहम आ गया,
शायद मेरे तड़पने का अंदाज़ भा गया।
साँसों से भी क़रीब मेरे आ गया कोई।
अब उस दिल-ए-तबाह की हालत ना पूछिए
बेनाम आरज़ुओं की लज़्ज़त ना पूछिए।
इक अजनबी था रूह का अरमान बन गया
इक हादसा था प्यार का उनवान बन गया।
मंज़िल का रास्ता मुझे दिखला गया कोई।
–
क़हर = Rage, Anger
जफ़ा = Oppression, Injustice
ज़ेहन = Mind
बरहम = Confused, Topsy-turvy, Angry, Vexed
लज़्ज़त = Deliciousness, Pleasurable Experience, Relish, Pleasure Enjoyment
उनवान = Legend
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ज |
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July 21, 2005
Lyricist:
Singer: Mehdi Hasan
हमारी साँसों में आजतक वो हिना की ख़ुशबू महक रही है।
लबों पे नग़में मचल रहे हैं नज़र से मस्ती छलक रही है।
कभी जो थे प्यार की ज़मानत वो हाथ हैं ग़ैर की अमानत
जो कसमें खाते थे चाहतों की उन्हीं की नीयत बहक रही है।
किसी से कोई गिला नहीं है, नसीब ही में वफ़ा नहीं है
जहाँ कहीं था हिना को खिलना हिना वहीं पे महक रही है।
वो जिनकी ख़ातिर ग़ज़ल कही था वो जिनकी ख़ातिर लिखे थे नग़मे
उन्हीं के आगे सवाल बन के ग़ज़ल की झाँझर झनक रही है।
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July 21, 2005
Lyricist:
Singer: Munni Begam
बेवफ़ा से भी प्यार होता है।
यार कुछ भी हो यार होता है।
साथ में उसके है रक़ीब तो क्या
फूल के साथ खार होता है।
जब वो आते नहीं शब-ए-वादा
मौत का इंतज़ार होता है।
दोस्त से क्यों भला न खाते फ़रेब
दोस्त का ऐतबार होता है।
इश्क की कायनात में पुर नम
हुस्न परवरदिगार होता है।
–
रक़ीब = Rival
खार = Thorn
कायनात = Universe
पुर नम = Tearful
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July 21, 2005
Lyricist:
Singer: Ghulam Ali
प्रीतम प्रीत लगा के दूर देश न जा
बसो हमारी नागरी हम माँगे तू खा।
–
मैंने लाखों के बोल सहे सितमगर तेरे लिए।
वो करें भी तो किन अलफ़ाज़ में शिकवा तेरा
जिनको तेरी निगाह-ए-लुत्फ़ ने बरबाद किया ।
इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर में बरबाद किया।
दुआ बहार की माँगी तो इतने फूल खिले
कहीं जगह ना मिली मेरे आशियाने को।
सुना है ग़ैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा लूँ गरीबखाने को।
–
नैना तुमरे प्यारे लगत हैं
मैंने क्या-क्या ज़ुल्म सहे सितमगर तेरे लिए।
तुम बिन लागे सूनी सेजरिया
तुम बिन काटे रैन गुजरिया।
मैंने क्या-क्या ज़ुल्म सहे सितमगर तेरे लिए।
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July 20, 2005
Lyricist:
Singer: Mehdi Hasan
दिल तड़पता है इक ज़माने से
आ भी जाओ किसी बहाने से।
बन गए दोस्त भी मेरे दुश्मन
इक तुम्हारे क़रीब आने से।
जब कि अपना तुम्हें बना ही लिया
कौन डरता है फिर ज़माने से।
तुम भी दुनिया से दुश्मनी ले लो
दोनों मिल जाएँ इस बहाने से।
चाहे सारा जहान मिट जाए
इश्क मिटता नहीं मिटाने से।
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July 19, 2005
Lyricist: Farhat Shahzad
Singer: Ghulam Ali
खाकर ज़ख़्म दुआ दी हमने
बस यूँ उम्र बिता दी हमने।
रात कुछ ऐसे दिल दुखता था
जैसे आस बुझा दी हमने।
सन्नाटे के शहर में तुझको
बे-आवाज़ सदा दी हमने।
होश जिसे कहती है दुनिया
वो दीवार गिरा दी हमने।
याद को तेरी टूट के चाहा
दिल को ख़ूब सज़ा दी हमने।
आ ‘शहज़ाद’ तुझे समझाएँ
क्यूँकर उम्र गँवा दी हमने।
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Farhat Shahzad |
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