खुली जो आँख तो वो था न वो ज़माना था
Lyricist: Farhat Sahzad
Singer: Mehdi Hasan
खुली जो आँख तो वो था न वो ज़माना था
दहकती आग थी तनहाई थी फ़साना था।
ग़मों ने बाँट लिया मुझे यूँ आपस में
कि जैसे मैं कोई लूटा हुआ ख़ज़ाना था।
ये क्या चंद ही क़दमों पे थक के बैठ गए
तुम्हें तो साथ मेरा दूर तक निभाना था।
मुझे जो मेरे लहू में डुबो के गुज़रा है
वो कोई ग़ैर नहीं यार एक पुराना था।
ख़ुद अपने हाथ से ‘शहज़ाद’ उसे काट दिया
कि जिस दरख़्त के तनहाई पे आशियाना था।
March 13, 2007 at 12:33 pm
in the last sher it should be ‘TEHNI’ not ‘TANHAI’.
Thanks
Dilshad
September 20, 2007 at 10:11 am
es ghazal ke bare me kya kahun
supper