हमारी साँसों में आजतक वो
Lyricist:
Singer: Mehdi Hasan
हमारी साँसों में आजतक वो हिना की ख़ुशबू महक रही है।
लबों पे नग़में मचल रहे हैं नज़र से मस्ती छलक रही है।
कभी जो थे प्यार की ज़मानत वो हाथ हैं ग़ैर की अमानत
जो कसमें खाते थे चाहतों की उन्हीं की नीयत बहक रही है।
किसी से कोई गिला नहीं है, नसीब ही में वफ़ा नहीं है
जहाँ कहीं था हिना को खिलना हिना वहीं पे महक रही है।
वो जिनकी ख़ातिर ग़ज़ल कही था वो जिनकी ख़ातिर लिखे थे नग़मे
उन्हीं के आगे सवाल बन के ग़ज़ल की झाँझर झनक रही है।
April 11, 2007 at 7:13 pm
kya ghazal hai
aisa dard aur kaha
hssan saab aap hamesha hamare dil me rahoge
May 4, 2007 at 9:47 am
कुछ पल जगजीत सिहँ के नामJanuary 7, 2007
क्या बताऍ के जॉ गई कैसे
Filed under: कोई बात चले, जगजीत सिहँ, Koi Baat Chale, गज़ल, Ghazal, Jagjit Singh, Albums — Amarjeet Singh @ 3:43 pm
क्या बताऍ के जॉ गई कैसे
फिर से दोहराऍ वो घड़ी कैसे
क्या बताऍ के जॉ गई कैसे
किसने रास्ते मे चॉद रखा था
मुझको ठोकर लगी कैसे
क्या बताऍ के जॉ गई कैसे
वक़्त पे पॉव कब रखा हमने
ज़िदगी मुह के बल गिरी कैसे
क्या बताऍ के जॉ गई कैसे
ऑख तो भर आई थी पानी से
तेरी तस्वीर जल गयी कैसे
क्या बताऍ के जॉ गई कैसे
हम तो अब याद भी नही करते
आप को हिचकी लग गई कैसे
क्या बताऍ के जॉ गई कैसे
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November 2, 2006
तेरी सूरत जो भरी रहती है आँखों में सदा
Filed under: कोई बात चले, जगजीत सिहँ, Koi Baat Chale, गज़ल, Ghazal, Jagjit Singh, Albums — Amarjeet Singh @ 2:00 pm
तेरी सूरत जो भरी रहती है आँखों में सदा
अजनबी चेहरे भी पहचाने से लगते हैं मुझे
तेरे रिश्तों में तो दुनियाँ ही पिरो ली मैने
एक से घर हैं सभी एक से हैं बाशिन्दे
अजनबी शहर मैं कुछ अजनबी लगता ही नहीं
एक से दर्द हैं सब एक से ही रिश्ते हैं
उम्र के खेल में इक तरफ़ा है ये रस्सकशी
इक सिरा मुझको दिया होता तो कुछ बात भी थी
मुझसे तगडा भी है और सामने आता भी नहीं
सामने आये मेरे देखा मुझे बात भी की
मुस्कुराये भी पुराने किसी रिश्ते के लिये
कल का अखबार था बस देख लिया रख भी दिया
वो मेरे साथ ही था दूर तक मग़र एक दिन
मुड के जो देखा तो वो और मेरे पास न था
जेब फ़ट जाये तो कुछ सिक्के भी खो जाते हैं
चौधंवे चाँद को फ़िर आग लगी है देखो
फ़िर बहुत देर तलक आज उजाला होगा
राख हो जायेगा जब फ़िर से अमावस होगी
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October 30, 2006
है लौ ज़िंदगी
Filed under: कोई बात चले, Gulzar, जगजीत सिहँ, Koi Baat Chale, गज़ल, Albums, Ghazal, Jagjit Singh, Gulzaar — Amarjeet Singh @ 1:29 pm
है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी
कभी सामने आता मिलने उसे
बड़ा नाम् उसका है मशहूर है
है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी
भवर पास है चल पहन ले इसे
किनारे का फदा बहुत दूर है
है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी
सुना है वो ही करने वाला है सब
सुना है के इंसान मज़बूर है
है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी
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October 27, 2006
सहमा सहमा
Filed under: कोई बात चले, Gulzar, जगजीत सिहँ, Koi Baat Chale, गज़ल, Albums, Ghazal, Jagjit Singh, Gulzaar — Amarjeet Singh @ 12:48 pm
सहमा सहमा डरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
इश्क में और कुछ नहीं होता
आदमी बावरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
एक पल देख लूँ
एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
जल गया सब जरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
चाँद जब आसमाँ पे आ जाए
आप का आसरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
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October 25, 2006
फुलों की तरह लब खोल कभी
Filed under: कोई बात चले, Gulzar, जगजीत सिहँ, Koi Baat Chale, गज़ल, Albums, Ghazal, Jagjit Singh, Gulzaar — Amarjeet Singh @ 10:32 am
फुलों की तरह लब खोल कभी
ख़ूश्बू की ज़ुबा मे बोल कभी
अलफ़ाज़ परखता रेहता है
आवाज़ हमारी तोल कभी
अन्मोल नहीं लेकिन फिर भी
पूछो तो मुफ़्त का मोल कभी
खिड़की में कटी है सब राते
कुछ चौर्स थीं, कुछ गोल कभी
ये दिल भी दोस्त ज़मीं की तरह
हो जाता है डांवां डोल कभी
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October 24, 2006
ज़िंदगी क्या है जानने के लिये
Filed under: कोई बात चले, Gulzar, जगजीत सिहँ, Koi Baat Chale, गज़ल, Albums, Ghazal, Jagjit Singh, Gulzaar — Amarjeet Singh @ 11:30 am
ज़िंदगी क्या है जानने के लिये
ज़िंदा रहना बहुत जरुरी है
आज तक कोई भी रहा तो नही
सारी वादी उदास बैठी है
मौसमे गुल ने खुदकशी कर ली
किसने बरुद बोया बागो मे
आओ हम सब पहन ले आइने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सारे हसीन लगेंगे यहाँ
है नही जो दिखाई देता है
आइने पर छपा हुआ चेहरा
तर्जुमा आइने का ठीक नही
हम को गलिब ने येह दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
ये बरस तो फकत दिनो मे गया
लब तेरे मीर ने भी देखे है
पखुड़ी एक गुलाब की सी है
बात सुनते तो गलिब रो जाते
ऐसे बिखरे है रात दिन जैसे
मोतियो वाला हार टूट गया
तुमने मुझको पिरो के रखा था
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October 23, 2006
आप अगर इन दिनो यहाँ होते
Filed under: कोई बात चले, Gulzar, जगजीत सिहँ, Koi Baat Chale, गज़ल, Albums, Ghazal, Jagjit Singh, Gulzaar — Amarjeet Singh @ 12:56 pm
आप अगर इन दिनो यहाँ होते
हम ज़मीन पर भला कहाँ होते
आप अगर इन दिनो यहाँ होते
वक़्त गुज़्रा नही अभी वरना
रेत पर पाँव के निशाँ होते
मेरे आगे नही था अगर कोई मेरे
पीछे तो कारवा होते
तेरे साहिल पे लौट कर आती
अगर उम्मीदो के बादबा होते
आप अगर इन दिनो यहाँ होते
हम ज़मीन पर भला कहाँ होते
आप अगर इन दिनो यहाँ होते
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October 20, 2006
नज़र उठाओ ज़रा तुम तो क़ायनात चल
Filed under: कोई बात चले, Gulzar, जगजीत सिहँ, Koi Baat Chale, गज़ल, Albums, Ghazal, Jagjit Singh, Gulzaar — Amarjeet Singh @ 11:23 am
नज़र उठाओ ज़रा तुम तो क़ायनात चले,
है इन्तज़ार कि आँखों से “कोई बात चले” ||
तुम्हारी मर्ज़ी बिना वक़्त भी अपाहज है
न दिन खिसकता है आगे, न आगे रात चले ||
न जाने उँगली छुडा के निकल गया है किधर
बहुत कहा था जमाने से साथ साथ चले ||
किसी भिखारी का टूटा हुआ कटोरा है
गले में डाले उसे आसमाँ पे रात चले ||
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