Lyricist: Adeem Hashmi
Singer: Ghulam Ali
फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था
सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था।
वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार सू
मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था।
रात भर पिछली ही आहट कान में आती रही
झाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था।
ख़ुद चढ़ा रखे थे तन पर अजनबीयत के गिलाफ़
वर्ना कब एक दूसरे को हमने पहचाना न था।
याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी’अदीम’
भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था।
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चार सू = In four directions, In all directions
गिलाफ़ = Cover, Envelope
October 19, 2005 at 9:13 am |
Faasle aise bhi honge yeh kabhi socha na tha. How true!
May 28, 2007 at 1:40 pm |
hi
June 8, 2007 at 7:21 pm |
March 12, 2009 at 1:04 pm |
Na uda yun thokron se
meri khake qabr zaalim
yehi ek reh gayi hai
mere pyar ki nishani
April 9, 2009 at 3:18 pm |
Kya baat haio